CBSE Class 10 Hindi (Course A) • Kshitij Part-2 • Prose (Gadya)
पाठ का सारांश (Summary):
रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित 'बालगोबिन भगत' एक सजीव रेखाचित्र (Sketch) है। इस पाठ में एक ऐसे अनूठे चरित्र को उकेरा गया है जो वास्तव में 'गृहस्थ' (Householder) होते हुए भी अपने आचरण, कर्म और विचारधारा से पूरी तरह 'संन्यासी' (Sadhu) है। वे कबीरदास को अपना 'साहब' मानते हैं और उनके गीतों को पूरी तल्लीनता से गाते हैं। पाठ में ग्रामीण जीवन की सजीव झाँकी, सामाजिक कुरीतियों पर करारा प्रहार और मानवतावादी दृष्टिकोण के दर्शन होते हैं। विशेषतः उनके इकलौते बेटे की मृत्यु पर उनका व्यवहार और अपनी युवा विधवा पतोहू (बहू) के पुनर्विवाह का निर्णय, उनकी प्रगतिशील सोच को दर्शाता है।
= अर्थ: यह कथन भगत जी ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी विलाप करती हुई बहू से कहा था। वे कबीर के निर्गुण ब्रह्म को मानते थे, जिसके अनुसार मृत्यु कोई दुख की बात नहीं है, बल्कि यह आत्मा और परमात्मा का अंतिम मिलन है। यह भगत जी की आध्यात्मिक गहराई को दर्शाता है।
प्रश्न 1: खेती-बारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण 'साधु' कहलाते थे?
उत्तर: बालगोबिन भगत थे तो गृहस्थ और खेती का कार्य करते थे, परंतु उनके संस्कार और आचरण बिल्कुल संन्यासियों (साधु) जैसे थे। वे कभी झूठ नहीं बोलते थे। किसी भी बात को साफ-साफ कहने में संकोच नहीं करते थे। वे कबीर को अपना आदर्श ('साहब') मानते थे और उनके द्वारा बताए रास्ते पर ही चलते थे। अपनी खेत की सारी पैदावार को पहले कबीरमठ में भेंट स्वरूप दे आते थे और वहाँ से जो 'प्रसाद' के रूप में बचता, उसी से अपने परिवार का लालन-पालन करते थे। सांसारिक मोह-माया के प्रति उनमें लेशमात्र भी लालच नहीं था। इन्ही उच्च आदर्शों के कारण वे गृहस्थ होते हुए भी 'साधु' कहलाते थे।
प्रश्न 2: भगत की पुत्रवधू (बहू) उन्हें अकेले क्यों नहीं छोड़ना चाहती थी?
उत्तर: बेटे की मृत्यु के बाद भगत जी अकेले रह गए थे और बुढ़ापे की ओर अग्रसर थे। उनकी पुत्रवधू (पतोहू) जानती थी कि भगत जी अपनी धुन के पक्के और साधु प्रवृत्ति के हैं। वे अपनी सेहत और खाने-पीने का बिलकुल भी ध्यान नहीं रखते थे। बहू को यह चिंता थी कि यदि वह (बहू) भी घर छोड़कर चली गई, तो इस बुढ़ापे में भगत जी के लिए भोजन कौन बनाएगा और उनके बीमार पड़ने पर उन्हें पानी कौन देगा। अपने इसी सेवा-भाव और भगत जी की चिंता के कारण वह उन्हें अकेला छोड़कर दूसरी शादी नहीं करना चाहती थी।
प्रश्न 3: बालगोबिन भगत ने समाज की किन-किन मान्यताओं और कुरीतियों पर प्रहार किया?
उत्तर: बालगोबिन भगत अपनी प्रगतिशील और कबीरपंथी सोच के कारण तात्कालिक समाज में व्याप्त रूढ़ियों पर सीधा प्रहार करते हैं। पहला प्रहार उन्होंने तब किया जब अपने इकलौते बेटे की मृत्यु पर शोक मनाने के बजाय उन्होंने कबीर के गीत गाए, यह मानते हुए कि मृत्यु शोक नहीं बल्कि उत्सव का विषय है (आत्मा का परमात्मा से मिलन)। दूसरा और सबसे बड़ा सामाजिक प्रहार उन्होंने तब किया जब उन्होंने बेटे को मुखाग्नि अपनी पुत्रवधू से ही दिलवाई (जबकि समाज में औरतों को यह अधिकार नहीं था)। तीसरा, श्राद्ध समाप्त होते ही उन्होंने अपनी युवा विधवा बहू के भाई को आदेश दिया कि इसकी दूसरी शादी कर देना, जो कि तत्कालीन हिंदू विधवा-विवाह निषेध की परंपरा के विरुद्ध एक बहुत बड़ा मानवतावादी कदम था।
प्रश्न 4: आषाढ़ की रिमझिम में गाँव के खेतों का दृश्य कैसा था और उस बीच भगत जी की गायन शैली का क्या प्रभाव पड़ रहा था?
उत्तर: आषाढ़ माह की पहली बारिश (रिमझिम) होते ही पूरा गाँव खेतों में उमड़ पड़ा था। कहीं हल चल रहे थे, तो कहीं औरतें बच्चे कीचड़ (लेवा) में लथपथ होकर धान की रोपाई कर रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी और आसमान बादलों से घिरा था। इसी मनमोहक माहौल के बीच बालगोबिन भगत कीचड़ में लथपथ अपने खेतों में रोपाई कर रहे थे। तभी उनके सुरीले कंठ से कबीर के गानों का स्वर फूट पड़ता है। उनके मधुर सुरों को सुनकर खेतों में काम कर रहे बच्चों, औरतों और हल चलाते किसानों के पैरों में एक अजीब सी लचक और लय आ जाती थी। उनका संगीत मानो सभी की थकान मिटाकर उन्हें जादू-सा जोश भर देता था।